श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 39: राजा युधिष्ठिरद्वारा धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्ती—इन तीनोंकी हड्डियोंको गङ्गामें प्रवाहित कराना तथा श्राद्धकर्म करना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  15.39.4 
स विवृद्धस्तदा वह्निर्वने तस्मिन्नभूत् किल।
तेन तद् वनमादीप्तमिति ते तापसाब्रुवन्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
कहते हैं कि वही अग्नि बढ़कर सम्पूर्ण वन में फैल गई और सब कुछ जलाकर राख कर दिया - ऐसा वहाँ के तपस्वियों ने मुझे बताया ॥4॥
 
It is said that the same fire grew and spread throughout the forest and burnt it all to ashes - the ascetics there told me this. ॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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