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mahabharat 15.38.7: मैं माता कुन्ती के लिए सबसे अधिक शोक करता हूँ, जिन्होंने अपने पुत्रों के समृद्ध और तेजस्वी धन को अस्वीकार करके वन में रहना स्वीकार किया ॥7॥   |   mahabharat अध्याय 15.38: नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 38: नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  15.38.7 
पृथामेव च शोचामि या पुत्रैश्वर्यमृद्धिमत्।
उत्सृज्य सुमहद् दीप्तं वनवासमरोचयत्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
मैं माता कुन्ती के लिए सबसे अधिक शोक करता हूँ, जिन्होंने अपने पुत्रों के समृद्ध और तेजस्वी धन को अस्वीकार करके वन में रहना स्वीकार किया ॥7॥
 
I grieve most for mother Kunti, who rejected the prosperous and radiant wealth of her sons and chose to live in the forest. ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)