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mahabharat 15.38.15-16h: हाय! उस महान वन में मन्त्रों से शुद्ध की गई अग्नियाँ विद्यमान होते हुए भी मेरे चाचा सांसारिक अग्नि में जलकर क्यों मर गए? ॥15 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 15.38: नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 38: नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन  »  श्लोक 15-16h
 
 
श्लोक  15.38.15-16h 
तिष्ठत्सु मन्त्रपूतेषु तस्याग्निषु महावने॥ १५॥
वृथाग्निना समायुक्तो निष्ठां प्राप्त: पिता मम।
 
 
अनुवाद
हाय! उस महान वन में मन्त्रों से शुद्ध की गई अग्नियाँ विद्यमान होते हुए भी मेरे चाचा सांसारिक अग्नि में जलकर क्यों मर गए? ॥15 1/2॥
 
Alas, despite the presence of fires purified by mantras in that great forest, why did my uncle die by being burnt in the worldly fire? ॥15 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)