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श्लोक 15.37.4  |
के देशा: परिदृष्टास्ते किं च कार्यं करोमि ते।
तद् ब्रूहि द्विजमुख्य त्वं त्वं ह्यस्माकं परा गति:॥ ४॥ |
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| अनुवाद |
| विप्रवर! इस समय में आपने किन-किन देशों का भ्रमण किया है? बताइए, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? क्योंकि आप ही हमारे लिए परम मोक्ष हैं।॥4॥ |
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| Vipravara! Which countries have you visited during this time? Tell me what service can I render to you? Because you are the ultimate salvation for us.'॥ 4॥ |
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