श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 33: परलोकसे आये हुए व्यक्तियोंका परस्पर राग-द्वेषसे रहित होकर मिलना और रात बीतनेपर अदृश्य हो जाना, व्यासजीकी आज्ञासे विधवा क्षत्राणियोंका गङ्गाजीमें गोता लगाकर अपने-अपने पतिके लोकको प्राप्त करना तथा इस पर्वके श्रवणकी महिमा  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  15.33.27 
प्रियै: समागमं तेषां य: सम्यक् शृणुयान्नर:।
प्रियाणि लभते नित्यमिह च प्रेत्य चैव स:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य कौरवों और पाण्डवों के अपने प्रियजनों से मिलने का वर्णन ध्यानपूर्वक सुनता है, वह इस लोक में तथा परलोक में भी अपनी इच्छित वस्तु प्राप्त करता है ॥27॥
 
He who listens carefully to the narration of the meeting of the Kauravas and the Pandavas with their beloved ones will obtain what he desires in this world as well as the next. ॥27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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