श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 33: परलोकसे आये हुए व्यक्तियोंका परस्पर राग-द्वेषसे रहित होकर मिलना और रात बीतनेपर अदृश्य हो जाना, व्यासजीकी आज्ञासे विधवा क्षत्राणियोंका गङ्गाजीमें गोता लगाकर अपने-अपने पतिके लोकको प्राप्त करना तथा इस पर्वके श्रवणकी महिमा  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  15.33.25 
यस्य यस्य तु य: कामस्तस्मिन् काले बभूव ह।
तं तं विसृष्टवान् व्यासो वरदो धर्मवत्सल:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
उस समय जिसके मन में जो भी इच्छा उत्पन्न हुई, धर्मप्रेमी और वरदाता भगवान व्यास ने उसे पूर्ण किया।
 
At that time whatever desire arose in anyone's mind, the Dharma-loving and boon-giving Lord Vyas fulfilled it all. 25.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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