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mahabharat 15.30.8: एक दिन जब मैं अपने महल की छत पर खड़ा था, तब मेरी दृष्टि उदित होते हुए सूर्य पर पड़ी। महर्षि दुर्वासा के वचनों का स्मरण करते हुए मैं दिन-रात सूर्यदेव की स्तुति करने लगा।॥8॥   |   mahabharat अध्याय 15.30: कुन्तीका कर्णके जन्मका गुप्त रहस्य बताना और व्यासजीका उन्हें सान्त्वना देना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 30: कुन्तीका कर्णके जन्मका गुप्त रहस्य बताना और व्यासजीका उन्हें सान्त्वना देना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  15.30.8 
अथ हर्म्यतलस्थाहं रविमुद्यन्तमीक्षती।
संस्मृत्य तदृषेर्वाक्यं स्पृहयन्ती दिवानिशम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
एक दिन जब मैं अपने महल की छत पर खड़ा था, तब मेरी दृष्टि उदित होते हुए सूर्य पर पड़ी। महर्षि दुर्वासा के वचनों का स्मरण करते हुए मैं दिन-रात सूर्यदेव की स्तुति करने लगा।॥8॥
 
One day when I was standing on the roof of my palace, my sight fell on the rising Sun. Remembering the words of Maharishi Durvasa, I started praying to the Sun God day and night.॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)