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mahabharat 15.30.23: कुन्ती! देवताओं के धर्म से मानव धर्म भ्रष्ट नहीं होता, यह जान लो। अब तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिए। 23॥   |   mahabharat अध्याय 15.30: कुन्तीका कर्णके जन्मका गुप्त रहस्य बताना और व्यासजीका उन्हें सान्त्वना देना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  15.30.23 
मनुष्यधर्मो दैवेन धर्मेण हि न दुष्यति।
इति कुन्ति विजानीहि व्येतु ते मानसो ज्वर:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
कुन्ती! देवताओं के धर्म से मानव धर्म भ्रष्ट नहीं होता, यह जान लो। अब तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिए। 23॥
 
Kunti! Human religion does not get corrupted by the religion of gods, know this. Now your mental worries should go away. 23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)