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श्लोक 15.30.18  |
यदि पापमपापं वा तवैतद् विवृतं मया।
तन्मे दहन्तं भगवन् व्यपनेतुं त्वमर्हसि॥ १८॥ |
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| अनुवाद |
| हे प्रभु! मेरा यह कार्य पाप है या पुण्य, यह मैंने आपको बता दिया है। कृपया मेरे इस दाहक शोक को दूर करें॥18॥ |
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| O Lord! Whether this act of mine is a sin or a good deed, I have revealed it to you. Please remove my burning grief.॥ 18॥ |
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