श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 30: कुन्तीका कर्णके जन्मका गुप्त रहस्य बताना और व्यासजीका उन्हें सान्त्वना देना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  15.30.17 
स मया मूढया पुत्रो ज्ञायमानोऽप्युपेक्षित:।
तन्मां दहति विप्रर्षे यथा सुविदितं तव॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मर्षि! मुझ मूर्खा स्त्री ने अपने पुत्र को पहचानकर भी उसकी उपेक्षा की। यह भूल मुझे निरंतर शोक से जला रही है। आप इसे भली-भाँति जानते हैं॥ 17॥
 
O Brahmarshi! Even though I, a foolish woman, recognized my son, I ignored him. This mistake continues to burn me with grief. You know this very well.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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