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mahabharat 15.30.11: उन्हें देखते ही मैं काँपने लगी। उन्होंने कहा, 'देवी! मुझसे कोई वर माँग लो।' तब मैंने सिर झुकाकर उनके चरण स्पर्श किए और कहा, 'कृपया यहाँ से चले जाइए।'   |   mahabharat अध्याय 15.30: कुन्तीका कर्णके जन्मका गुप्त रहस्य बताना और व्यासजीका उन्हें सान्त्वना देना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 30: कुन्तीका कर्णके जन्मका गुप्त रहस्य बताना और व्यासजीका उन्हें सान्त्वना देना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  15.30.11 
स मामुवाच वेपन्तीं वरं मत्तो वृणीष्व ह।
गम्यतामिति तं चाहं प्रणम्य शिरसावदम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
उन्हें देखते ही मैं काँपने लगी। उन्होंने कहा, 'देवी! मुझसे कोई वर माँग लो।' तब मैंने सिर झुकाकर उनके चरण स्पर्श किए और कहा, 'कृपया यहाँ से चले जाइए।'
 
I started trembling as soon as I saw him. He said, 'Devi! Ask me for a boon.' Then I bowed my head and touched his feet and said, 'Please go away from here.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)