श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  15.3.84 
न कामये नरश्रेष्ठ जीवितं पृथिवीं तथा।
यथा तव प्रियं राजंश्चिकीर्षामि परंतप॥ ८४॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुषोत्तम! मुझे न तो जीवन चाहिए, न पृथ्वी का राज्य। हे ​​महाप्रभु! मैं आपके लिए जो भी उत्तम हो, वही करना चाहता हूँ॥ 84॥
 
‘Best of men! I neither want life nor the kingdom of the earth. O King of the Magnificent! I want to do whatever is best for you.॥ 84॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)