श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना  »  श्लोक 74
 
 
श्लोक  15.3.74 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु कौन्तेय: पित्रा ज्येष्ठेन भारत।
पस्पर्श सर्वगात्रेषु सौहार्दात् तं शनैस्तदा॥ ७४॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं: भरत! जब उनके बड़े भाई धृतराष्ट्र ने ऐसा कहा, तब कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने बड़े स्नेह से उनके सम्पूर्ण शरीर पर धीरे से हाथ फेरा।
 
Vaishmpayana says: Bhaarata! When his elder brother Dhritarashtra said this, Yudhishthira, the son of Kunti, gently stroked his entire body with great affection.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)