श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  15.3.68 
तेन रत्नौषधिमता पुण्येन च सुगन्धिना।
पाणिस्पर्शेन राज्ञ: स राजा संज्ञामवाप ह॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
महाराज युधिष्ठिर के रत्न-औषधियों से भरे पवित्र एवं सुगन्धित हस्त के स्पर्श से राजा धृतराष्ट्र को चेतना वापस आ गई।
 
King Dhritarashtra regained consciousness at the touch of Maharaja Yudhishthira's sacred and fragrant hand filled with gem medicines.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)