श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  15.3.67 
वैशम्पायन उवाच
ततोऽस्य पाणिना राजन् जलशीतेन पाण्डव:।
उरो मुखं च शनकै: पर्यमार्जत धर्मवित्॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन ! ऐसा कहकर धर्मज्ञ पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर ने जल से ठण्डे हाथ से धृतराष्ट्र की छाती और मुँह को धीरे-धीरे पोंछा ॥67॥
 
Vaishampayanji says – King! Saying this, Yudhishthira, the son of Pandu, an expert in religion, slowly wiped Dhritarashtra's chest and mouth with his hand cooled with water. 67॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)