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mahabharat 15.28.6: राजन! जो कुन्ती अपने पुत्रों को त्यागकर गुरुजनों की सेवा में लगी हुई है, क्या वह अहंकाररहित होकर आपकी सेवा करती है?   |   mahabharat अध्याय 15.28: महर्षि व्यासका धृतराष्ट्रसे कुशल पूछते हुए विदुर और युधिष्ठिरकी धर्मरूपताका प्रतिपादन करना और उनसे अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये कहना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 28: महर्षि व्यासका धृतराष्ट्रसे कुशल पूछते हुए विदुर और युधिष्ठिरकी धर्मरूपताका प्रतिपादन करना और उनसे अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये कहना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  15.28.6 
कच्चित् कुन्ती च राजंस्त्वां शुश्रूषत्यनहंकृता।
या परित्यज्य स्वं पुत्रं गुरुशुश्रूषणे रता॥ ६॥
 
 
अनुवाद
राजन! जो कुन्ती अपने पुत्रों को त्यागकर गुरुजनों की सेवा में लगी हुई है, क्या वह अहंकाररहित होकर आपकी सेवा करती है?
 
King! Kunti, who has abandoned her sons and is engaged in the service of her teachers, does she serve you without any ego? 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)