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mahabharat 15.28.3: राजा! क्या अब तुम्हें अपने पुत्रों की मृत्यु का कभी दुःख नहीं होता? हे पापरहित राजा! क्या तुम्हारी समस्त इन्द्रियाँ शुद्ध हो गई हैं?   |   mahabharat अध्याय 15.28: महर्षि व्यासका धृतराष्ट्रसे कुशल पूछते हुए विदुर और युधिष्ठिरकी धर्मरूपताका प्रतिपादन करना और उनसे अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये कहना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 28: महर्षि व्यासका धृतराष्ट्रसे कुशल पूछते हुए विदुर और युधिष्ठिरकी धर्मरूपताका प्रतिपादन करना और उनसे अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये कहना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  15.28.3 
कच्चिद् हृदि न ते शोको राजन् पुत्रविनाशज:।
कच्चिज्ज्ञानानि सर्वाणि सुप्रसन्नानि तेऽनघ॥ ३॥
 
 
अनुवाद
राजा! क्या अब तुम्हें अपने पुत्रों की मृत्यु का कभी दुःख नहीं होता? हे पापरहित राजा! क्या तुम्हारी समस्त इन्द्रियाँ शुद्ध हो गई हैं?
 
King! Now, don't you ever feel sad for the death of your sons? Sinless king! Have all your senses become pure? 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)