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mahabharat 15.28.19: जिस प्रकार अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाश इस लोक और परलोक में विद्यमान रहते हैं, उसी प्रकार धर्म भी दोनों लोकों में विद्यमान रहता है॥19॥   |   mahabharat अध्याय 15.28: महर्षि व्यासका धृतराष्ट्रसे कुशल पूछते हुए विदुर और युधिष्ठिरकी धर्मरूपताका प्रतिपादन करना और उनसे अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये कहना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 28: महर्षि व्यासका धृतराष्ट्रसे कुशल पूछते हुए विदुर और युधिष्ठिरकी धर्मरूपताका प्रतिपादन करना और उनसे अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये कहना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  15.28.19 
यथा वह्निर्यथा वायुर्यथाऽऽप: पृथिवी यथा।
यथाऽऽकाशं तथा धर्म इह चामुत्र च स्थित:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाश इस लोक और परलोक में विद्यमान रहते हैं, उसी प्रकार धर्म भी दोनों लोकों में विद्यमान रहता है॥19॥
 
‘Just as fire, air, water, earth and sky exist in this world and the next, similarly, Dharma also exists in both the worlds.॥ 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)