श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 26: धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा विदुरजीका युधिष्ठिरके शरीरमें प्रवेश  »  श्लोक 37-38
 
 
श्लोक  15.26.37-38 
यदर्थो हि नरो राजंस्तदर्थोऽस्यातिथि: स्मृत:।
इत्युक्त: स तथेत्येवं प्राह धर्मात्मजो नृपम्॥ ३७॥
फलं मूलं च बुभुजे राज्ञा दत्तं सहानुज:।
ततस्ते वृक्षमूलेषु कृतवासपरिग्रहा:।
तां रात्रिमवसन् सर्वे फलमूलजलाशना:॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
‘हे राजन! मनुष्य को अपने अतिथियों को उन्हीं वस्तुओं से भोजन कराना चाहिए जिनका वह स्वयं उपयोग करता है - यही शास्त्रों की आज्ञा है।’ यह सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर ने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और भाइयों सहित उनके द्वारा अर्पित फल-मूल खाए। तत्पश्चात, उन सभी ने वृक्षों के नीचे केवल फल, मूल और जल खाकर रहने का निश्चय किया और वहीं रात्रि बिताई।
 
‘O King! A man should serve his guests with the same things that he himself uses – this is the command of the scriptures.’ On hearing this, Dharmaraja Yudhishthira accepted his order saying ‘very good’ and ate the fruits and roots offered by him along with his brothers. Thereafter, all of them decided to live under the trees, eating only fruits, roots and water and spent the night there.
 
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि विदुरनिर्याणे षड्‍‍विंशोऽध्याय:॥ २६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें विदुरका देहत्यागविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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