श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 2: पाण्डवोंका धृतराष्ट्र और गान्धारीके अनुकूल बर्ताव  »  श्लोक 23-24h
 
 
श्लोक  15.2.23-24h 
न तां प्रीतिं परामाप पुत्रेभ्य: स कुरूद्वह:॥ २३॥
यां प्रीतिं पाण्डुपुत्रेभ्य: सदावाप नराधिप:।
 
 
अनुवाद
राजा धृतराष्ट्र पाण्डवों के आचरण से सदैव प्रसन्न रहते थे। उन्हें अपने पुत्रों से ऐसा प्रेम कभी नहीं मिला था ॥23 1/2॥
 
King Dhritarashtra was always pleased with the behaviour of the Pandavas. He had never received such love from his own sons. ॥ 23 1/2 ॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)