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mahabharat 15.19.18: धर्म और अर्थ के ज्ञाता तथा उत्तम बुद्धि वाले विदुरजी भी वल्कल और चीर-फाड़ धारण करके संजय सहित गांधारी और धृतराष्ट्र की सेवा करने लगे। वे अपने मन को वश में करके दुर्बल शरीर से घोर तपस्या में लगे रहते थे। 18॥   |   mahabharat अध्याय 15.19: धृतराष्ट्र आदिका गङ्गातटपर निवास करके वहाँसे कुरुक्षेत्रमें जाना और शतयूपके आश्रमपर निवास करना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 19: धृतराष्ट्र आदिका गङ्गातटपर निवास करके वहाँसे कुरुक्षेत्रमें जाना और शतयूपके आश्रमपर निवास करना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  15.19.18 
क्षत्ता च धर्मार्थविदग्रॺबुद्धि:
ससंजयस्तं नृपतिं सदारम्।
उपाचरद् घोरतपो जितात्मा
तदा कृशो वल्कलचीरवासा:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
धर्म और अर्थ के ज्ञाता तथा उत्तम बुद्धि वाले विदुरजी भी वल्कल और चीर-फाड़ धारण करके संजय सहित गांधारी और धृतराष्ट्र की सेवा करने लगे। वे अपने मन को वश में करके दुर्बल शरीर से घोर तपस्या में लगे रहते थे। 18॥
 
Vidurji, who was knowledgeable about religion and economics and had excellent intelligence, also started serving Gandhari and Dhritarashtra along with Sanjay, dressed in valkal and rags. He used to control his mind and engage in severe penance with his weak body. 18॥
 
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि शतयूपाश्रमनिवासे एकोनविंशोऽध्याय:॥ १९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष्ट्रका शतयूपके आश्रमपर निवासविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १९॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)