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mahabharat 15.16.31: कुन्ती की बुद्धि अपार थी, उसने वनवास जाने का दृढ़ निश्चय कर लिया था; इसलिए वह अपने रोते हुए पुत्रों को बार-बार देखती हुई आगे बढ़ती रही ॥31॥   |   mahabharat अध्याय 15.16: धृतराष्ट्रका पुरवासियोंको लौटाना और पाण्डवोंके अनुरोध करनेपर भी कुन्तीका वनमें जानेसे न रुकना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  15.16.31 
सा पुत्रान् रुदत: सर्वान् मुहुर्मुहुरवेक्षती।
जगामैव महाप्राज्ञा वनाय कृतनिश्चया॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
कुन्ती की बुद्धि अपार थी, उसने वनवास जाने का दृढ़ निश्चय कर लिया था; इसलिए वह अपने रोते हुए पुत्रों को बार-बार देखती हुई आगे बढ़ती रही ॥31॥
 
Kunti's wisdom was vast. She had firmly decided to go into exile; therefore she kept moving forward, looking again and again at all her crying sons. ॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)