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mahabharat 15.11.13-14h: 'पुरुषसिंह! अतः तुम्हें उन्हें धन देने के अतिरिक्त कोई अन्य उपाय नहीं अपनाना चाहिए। महाबाहो! उनके अनुरोध को अस्वीकार करने से बढ़कर हमारे लिए कोई बड़ा अपमान नहीं होगा। उन्हें धन न देने से हमें भी पाप का भागी बनना पड़ेगा।'   |   mahabharat अध्याय 15.11: धृतराष्ट्रका विदुरके द्वारा युधिष्ठिरसे श्राद्धके लिये धन माँगना, अर्जुनकी सहमति और भीमसेनका विरोध   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 11: धृतराष्ट्रका विदुरके द्वारा युधिष्ठिरसे श्राद्धके लिये धन माँगना, अर्जुनकी सहमति और भीमसेनका विरोध  »  श्लोक 13-14h
 
 
श्लोक  15.11.13-14h 
मा तेऽन्यत् पुरुषव्याघ्र दानाद् भवतु दर्शनम्॥ १३॥
अयशस्यमतोऽन्यत् स्यादधर्मश्च महाभुज।
 
 
अनुवाद
'पुरुषसिंह! अतः तुम्हें उन्हें धन देने के अतिरिक्त कोई अन्य उपाय नहीं अपनाना चाहिए। महाबाहो! उनके अनुरोध को अस्वीकार करने से बढ़कर हमारे लिए कोई बड़ा अपमान नहीं होगा। उन्हें धन न देने से हमें भी पाप का भागी बनना पड़ेगा।'
 
‘Purushasingh! Therefore, you should not adopt any other approach except giving them money. Mahabaho! There will be no greater disgrace for us than refusing their request. By not giving them money, we will also have to become a part of sin. 13 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)