श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 10: प्रजाकी ओरसे साम्ब नामक ब्राह्मणका धृतराष्ट्रको सान्त्वनापूर्ण उत्तर देना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  15.10.15 
न जात्वस्य च वंशस्य राज्ञां कश्चित् कदाचन।
राजाऽऽसीद् य: प्रजापाल: प्रजानामप्रियोऽभवत्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
‘इस वंश में ऐसा कोई राजा नहीं हुआ जो अपनी प्रजा का पालन-पोषण करते हुए उससे प्रेम न करता हो ॥15॥
 
‘There has never been a king in this dynasty who was not loved by all his subjects while taking care of them.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)