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mahabharat 14.97.d3-d4: सुना है कि मनुष्य लोक में आत्मा अपने अच्छे-बुरे कर्मों से बंधी रहती है। मृत्यु के बाद यमराज के आदेश पर उनके भयंकर, उग्र और अत्यंत वीर दूत उसे कठिन रस्सियों से बाँधकर पीटते हुए ले जाते हैं। वह इधर-उधर भागने की कोशिश करता है।   |   mahabharat अध्याय 14.97: यमलोकके मार्गका कष्ट और उससे बचनेके उपाय   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 97: यमलोकके मार्गका कष्ट और उससे बचनेके उपाय  »  श्लोक d3-d4
 
 
श्लोक  14.97.d3-d4 
जीवस्य कर्मलोकेषु कर्मभिस्तु शुभाशुभै:।
अनुबद्धस्य तै: पाशैर्नीयमानस्य दारुणै:॥
मृत्युदूतैर्दुराधर्षैर्घोरैर्घोरपराक्रमै:।
वद्धस्याक्षिप्यमाणस्य विद्रुतस्य यमाज्ञया॥
 
 
अनुवाद
सुना है कि मनुष्य लोक में आत्मा अपने अच्छे-बुरे कर्मों से बंधी रहती है। मृत्यु के बाद यमराज के आदेश पर उनके भयंकर, उग्र और अत्यंत वीर दूत उसे कठिन रस्सियों से बाँधकर पीटते हुए ले जाते हैं। वह इधर-उधर भागने की कोशिश करता है।
 
It is heard that in the human world, the soul is bound by its good and bad deeds. After death, on the orders of Yamraj, the fierce, fierce and extremely brave messengers of Yamraj tie him with difficult ropes and take him away while beating him. He tries to run here and there.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)