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mahabharat 14.97.d18: उस समय उसके मित्र और सम्बन्धी दुःख से पीड़ित होकर करुण स्वर में विलाप करने लगते हैं, फिर भी वह इन सब बातों से उदासीन होकर अपने सभी मित्रों और सम्बन्धियों को त्यागकर चला जाता है।   |   mahabharat अध्याय 14.97: यमलोकके मार्गका कष्ट और उससे बचनेके उपाय   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 97: यमलोकके मार्गका कष्ट और उससे बचनेके उपाय  »  श्लोक d18
 
 
श्लोक  14.97.d18 
आक्रन्दमान: करुणं बन्धुभिर्दु:खपीडितै:।
त्यक्त्वा बन्धुजनं सर्वं निरपेक्षस्तु गच्छति॥
 
 
अनुवाद
उस समय उसके मित्र और सम्बन्धी दुःख से पीड़ित होकर करुण स्वर में विलाप करने लगते हैं, फिर भी वह इन सब बातों से उदासीन होकर अपने सभी मित्रों और सम्बन्धियों को त्यागकर चला जाता है।
 
At that time his friends and relatives, afflicted with grief, begin to lament in pitiful tones, but yet he, being indifferent to all this, abandons all his friends and relatives and goes away.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)