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mahabharat 14.96.d23: जो ब्राह्मण 'भूर्भुवः स्वः' शब्दों से गायत्री का जप करता है, वेदों का स्वाध्याय करता है और अपनी पत्नी से प्रेम करता है, वह जितेन्द्रिय, विद्वान् और इस जगत का देवता है।   |   mahabharat अध्याय 14.96: बीज और योनिकी शुद्धि तथा गायत्री-जपकी और ब्राह्मणोंकी महिमाका और उनके तिरस्कारके भयानक फलका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 96: बीज और योनिकी शुद्धि तथा गायत्री-जपकी और ब्राह्मणोंकी महिमाका और उनके तिरस्कारके भयानक फलका वर्णन  »  श्लोक d23
 
 
श्लोक  14.96.d23 
भूर्भुव: स्वरिति ब्रह्म यो वेदनिरतो द्विज:।
स्वदारनिरतो दान्त: स विद्वान् स च भूसुर:॥
 
 
अनुवाद
जो ब्राह्मण 'भूर्भुवः स्वः' शब्दों से गायत्री का जप करता है, वेदों का स्वाध्याय करता है और अपनी पत्नी से प्रेम करता है, वह जितेन्द्रिय, विद्वान् और इस जगत का देवता है।
 
The Brahmin who chants Gayatri with the words 'Bhurbhuvah Swah', engages in self-study of the Vedas and loves his own wife, is the Jitendriya, the scholar and the god of this world.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)