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mahabharat 14.96.d18: तथा सूर्य आदि ग्रहों में जो उसके लिए अशुभ हैं तथा हानि पहुँचाते हैं, वे भी गायत्री मंत्र के जप के प्रभाव से शान्त, शुभ तथा लाभकारी हो जाते हैं।   |   mahabharat अध्याय 14.96: बीज और योनिकी शुद्धि तथा गायत्री-जपकी और ब्राह्मणोंकी महिमाका और उनके तिरस्कारके भयानक फलका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 96: बीज और योनिकी शुद्धि तथा गायत्री-जपकी और ब्राह्मणोंकी महिमाका और उनके तिरस्कारके भयानक फलका वर्णन  »  श्लोक d18
 
 
श्लोक  14.96.d18 
ये चास्य दु:स्थिता: केचिद् ग्रहा: सूर्यादयो दिवि।
ते चास्य सौम्या जायन्ते शिवा: शुभकरास्तथा॥
 
 
अनुवाद
तथा सूर्य आदि ग्रहों में जो उसके लिए अशुभ हैं तथा हानि पहुँचाते हैं, वे भी गायत्री मंत्र के जप के प्रभाव से शान्त, शुभ तथा लाभकारी हो जाते हैं।
 
And among the planets like the Sun, which are inauspicious for him and cause harm, they too become peaceful, auspicious and beneficial due to the influence of Gayatri Mantra chanting.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)