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mahabharat 14.96.d15: जो लोग गृहस्थ अवस्था में रहते हुए अखंड ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए पंच यज्ञों में तत्पर रहते हैं, वे पृथ्वी पर धर्म की स्थापना करते हैं।   |   mahabharat अध्याय 14.96: बीज और योनिकी शुद्धि तथा गायत्री-जपकी और ब्राह्मणोंकी महिमाका और उनके तिरस्कारके भयानक फलका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.96.d15 
अविप्लुतब्रह्मचर्यैर्गृहस्थाश्रममाश्रितै:।
पञ्चयज्ञपरैर्धर्म: स्थाप्यते पृथिवीतले॥
 
 
अनुवाद
जो लोग गृहस्थ अवस्था में रहते हुए अखंड ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए पंच यज्ञों में तत्पर रहते हैं, वे पृथ्वी पर धर्म की स्थापना करते हैं।
 
Those who, while living in the householder's stage and observing unbroken celibacy, remain devoted to the five sacrifices, establish Dharma on the earth.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)