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mahabharat 14.96.d12: वह अशुद्ध वीर्य शुद्ध योनि वाली स्त्री के लिए उपयुक्त नहीं है; उसके सम्पर्क से शुद्ध योनि भी कुत्ते द्वारा चाटे गए वीर्य के समान दूषित हो जाती है।   |   mahabharat अध्याय 14.96: बीज और योनिकी शुद्धि तथा गायत्री-जपकी और ब्राह्मणोंकी महिमाका और उनके तिरस्कारके भयानक फलका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 96: बीज और योनिकी शुद्धि तथा गायत्री-जपकी और ब्राह्मणोंकी महिमाका और उनके तिरस्कारके भयानक फलका वर्णन  »  श्लोक d12
 
 
श्लोक  14.96.d12 
अशुद्धं तद् भवेद् बीजं शुद्धां योनिं न चार्हति।
दूषयत्यपि तां योनिं शुना लीढं हविर्यथा॥
 
 
अनुवाद
वह अशुद्ध वीर्य शुद्ध योनि वाली स्त्री के लिए उपयुक्त नहीं है; उसके सम्पर्क से शुद्ध योनि भी कुत्ते द्वारा चाटे गए वीर्य के समान दूषित हो जाती है।
 
That impure semen is not suitable for a woman with a pure vagina; due to its contact, even a pure vagina gets contaminated like the semen licked by a dog.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)