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mahabharat 14.93.d56: ब्रह्मा की रात्रि, जो एक हजार युग तक रहती है, के पूर्ण होने तक महार्णव में शयन करके मैं चर और चर प्राणियों की रचना करता हूँ।   |   mahabharat अध्याय 14.93: युधिष्ठिरका वैष्णव-धर्मविषयक प्रश्न और भगवान‍् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.93.d56 
सहस्रयुगपर्यन्तां ब्राह्मीं रात्रिं महार्णवे।
स्थित्वा सृजामि भूतानि जङ्गमानि स्थिराणि च॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्मा की रात्रि, जो एक हजार युग तक रहती है, के पूर्ण होने तक महार्णव में शयन करके मैं चर और चर प्राणियों की रचना करता हूँ।
 
After sleeping in Maharnava till the completion of Brahma's night which lasts for a thousand yugas, I create living and movable beings.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)