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mahabharat 14.93.d51-d52: राजन! मैं अचिन्त्य, नित्य, अमर, अजन्मा, नित्य, अमर, अपरिमेय, अविनाशी, निर्गुण, अत्यन्त स्वरूप, निर्द्वन्द्व, निर्मल, विकाररहित तथा मोक्ष आदि का कारण हूँ। नरेश्वर! मैं सुधा, स्वधा और स्वाहा भी हूँ।   |   mahabharat अध्याय 14.93: युधिष्ठिरका वैष्णव-धर्मविषयक प्रश्न और भगवान‍् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.93.d51-d52 
अचिन्त्योऽहमनन्तोऽहमजरोऽहमजो ह्यहम्।
अनाद्योऽहमवध्योऽहमप्रमेयोऽहमव्यय:॥
निर्गुणोऽहं निगूढात्मा निर्द्वन्द्वो निर्ममो नृप।
निष्कलो निर्विकारोऽहं निदानममृतस्य तु॥
सुधा चाहं स्वधा चाहं स्वाहा चाहं नराधिप।
 
 
अनुवाद
राजन! मैं अचिन्त्य, नित्य, अमर, अजन्मा, नित्य, अमर, अपरिमेय, अविनाशी, निर्गुण, अत्यन्त स्वरूप, निर्द्वन्द्व, निर्मल, विकाररहित तथा मोक्ष आदि का कारण हूँ। नरेश्वर! मैं सुधा, स्वधा और स्वाहा भी हूँ।
 
King! I am unthinkable, eternal, immortal, unborn, eternal, immortal, immeasurable, indestructible, nirguna, deep form, non-conflict, ruthless, clean, disorderless and the cause of salvation etc. Nareshwar! I am also Sudha, Swadha and Swaha.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)