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mahabharat 14.93.d38: मेरा अत्यंत गुप्त, शाश्वत, अचल और अविनाशी रूप मेरे भक्तों को इस प्रकार अनुभव होता है, जैसा कि देवता भी नहीं कर सकते।   |   mahabharat अध्याय 14.93: युधिष्ठिरका वैष्णव-धर्मविषयक प्रश्न और भगवान‍् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.93.d38 
यच्च रूपं परं गुह्यं कूटस्थमचलं ध्रुवम्।
न दृश्यते तथा देवैर्मद्भक्तैर्दृश्यते यथा॥
 
 
अनुवाद
मेरा अत्यंत गुप्त, शाश्वत, अचल और अविनाशी रूप मेरे भक्तों को इस प्रकार अनुभव होता है, जैसा कि देवता भी नहीं कर सकते।
 
My extremely secret, eternal, immovable and indestructible form is experienced by my devotees in a way that even the gods cannot.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)