श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 92: महर्षि अगस्त्यके यज्ञकी कथा  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  14.92.52 
धर्मपुत्रमथाक्षिप्य सक्तुप्रस्थेन तेन स:।
मुक्त: शापात् तत: क्रोधो धर्मो ह्यासीद् युधिष्ठिर:॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
धर्मपुत्र युधिष्ठिर की निन्दा करके तथा उन्हें एक किलो सत्तू दान करने का माहात्म्य बताकर क्रोधरूपी धर्म शाप से मुक्त हो गया और वह धर्मराज युधिष्ठिर से जुड़ गया ॥ 52॥
 
By criticising Dharma's son Yudhishthir and telling him the significance of donating a kilo of gram flour (sattu), Dharma in the form of anger was freed from the curse and he became associated with Dharmaraja Yudhishthir. ॥ 52॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)