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श्लोक 14.92.32  |
वेदांश्च ब्रह्मचर्येण न्यायत: प्रार्थयामहे।
न्यायेनोत्तरकालं च गृहेभ्यो नि:सृता वयम्॥ ३२॥ |
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| अनुवाद |
| ब्रह्मचर्य का पालन करके हम न्यायपूर्वक वेदों को प्राप्त करना चाहते हैं और अन्त में हमने न्यायपूर्वक ही घर छोड़ा है॥ 32॥ |
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| By observing celibacy we wish to acquire the Vedas in a just manner, and ultimately we have left our home in a just manner.॥ 32॥ |
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