श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 92: महर्षि अगस्त्यके यज्ञकी कथा  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  14.92.28 
इत्युक्ते सर्वमेवैतदभवत् तपसा मुने:।
तस्य दीप्ताग्निमहसस्त्वगस्त्यस्यातितेजस:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी और अत्यंत तेजस्वी महर्षि अगस्त्य के ऐसा कहते ही उनकी तपस्या के प्रभाव से ये सब वस्तुएँ वहाँ उपस्थित हो गईं ॥28॥
 
As soon as Maharishi Agastya, who was as bright as a blazing fire and extremely radiant, said this, all these things were presented there due to the effect of his penance. 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)