श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 92: महर्षि अगस्त्यके यज्ञकी कथा  »  श्लोक 26-27
 
 
श्लोक  14.92.26-27 
उत्तरेभ्य: कुरुभ्यश्च यत् किंचिद् वसु विद्यते॥ २६॥
सर्वं तदिह यज्ञेषु स्वयमेवोपतिष्ठतु।
स्वर्ग: स्वर्गसदश्चैव धर्मश्च स्वयमेव तु॥ २७॥
 
 
अनुवाद
उत्तर कुरुवर्ष में जो भी धन है, वह सब मेरे यज्ञों में उपस्थित हो। स्वर्ग, स्वर्ग में रहने वाले देवता और धर्म भी यहीं निवास करें।॥26-27॥
 
All the wealth present in Uttara Kuruvarsha should present itself here in my yajnas. Heaven, the gods residing in heaven and Dharma should themselves reside here.'॥ 26-27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)