| श्री महाभारत » पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व » अध्याय 92: महर्षि अगस्त्यके यज्ञकी कथा » श्लोक 21-22h |
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| | | | श्लोक 14.92.21-22h  | नेदं शक्यं वृथा कर्तुं मम सत्रं कथंचन॥ २१॥
वर्षिष्यतीह वा देवो न वा वर्षं भविष्यति। | | | | | | अनुवाद | | चाहे इन्द्र यहाँ वर्षा करें या न करें, मुझे इसकी कोई परवाह नहीं। मेरा यह यज्ञ किसी भी प्रकार व्यर्थ नहीं जा सकता।॥21/2॥ | | | | Whether Lord Indra rains here or it does not rain here, I do not care. This sacrifice of mine cannot be wasted in any way. ॥ 21/2॥ | | ✨ ai-generated | | |
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