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mahabharat 14.91.27: जो मूर्ख बार-बार अधर्म से अर्जित धन का संचय करता है और जो धर्म में संदेह रखते हुए यज्ञ करता है, वह धर्म का फल नहीं पाता॥ 27॥   |   mahabharat अध्याय 14.91: हिंसामिश्रित यज्ञ और धर्मकी निन्दा   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 91: हिंसामिश्रित यज्ञ और धर्मकी निन्दा  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  14.91.27 
अन्यायोपगतं द्रव्यमभीक्ष्णं यो ह्यपण्डित:।
धर्माभिशंकी यजते न स धर्मफलं लभेत्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
जो मूर्ख बार-बार अधर्म से अर्जित धन का संचय करता है और जो धर्म में संदेह रखते हुए यज्ञ करता है, वह धर्म का फल नहीं पाता॥ 27॥
 
A fool who repeatedly accumulates wealth earned through wrongdoings and who performs sacrifices while having doubts about Dharma, does not reap the fruits of Dharma.॥ 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)