श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 90: युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना  »  श्लोक 96-97h
 
 
श्लोक  14.90.96-97h 
सहस्रशक्तिश्च शतं शतशक्तिर्दशापि च॥ ९६॥
दद्यादपश्च य: शक्त्या सर्वे तुल्यफला: स्मृता:।
 
 
अनुवाद
भक्तिपूर्वक दान देनेवाला मनुष्य यदि एक हजार दान देने की क्षमता रखता हो तो उसे सौ दान देने चाहिए, यदि सौ दान देने की क्षमता रखता हो तो उसे दस दान देने चाहिए और यदि जिसके पास कुछ भी न हो तो वह अपनी क्षमता के अनुसार यदि जल भी दान करे तो इन सबका फल समान माना जाता है॥96 1/2॥
 
If a person who gives charity with devotion has the capacity to donate a thousand then he should donate a hundred, if one has the capacity to donate a hundred then he should donate ten and if one who has nothing then if he donates even water according to his capacity then the result of all these is considered to be equal.॥ 96 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)