श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 90: युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना  »  श्लोक 92-93h
 
 
श्लोक  14.90.92-93h 
यदा दानरुचि: स्याद् वै तदा धर्मो न सीदति।
अनवेक्ष्य सुतस्नेहं कलत्रस्नेहमेव च॥ ९२॥
धर्ममेव गुरुं ज्ञात्वा तृष्णा न गणिता त्वया।
 
 
अनुवाद
‘जब मनुष्य में दान की इच्छा उत्पन्न हो जाती है, तब उसका धर्म क्षीण नहीं होता। तुमने अपनी पत्नी के प्रेम और पुत्र के स्नेह की उपेक्षा करके धर्म को ही श्रेष्ठ माना है और उसकी तुलना में भूख-प्यास को तुच्छ समझा है।॥ 92 1/2॥
 
‘When a man develops a liking for charity, his Dharma does not diminish. You have ignored the love of your wife and the affection of your son and have considered Dharma to be the best and have considered hunger and thirst to be nothing in comparison to it.॥ 92 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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