श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 90: युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना  »  श्लोक 83
 
 
श्लोक  14.90.83 
शुद्धेन तव दानेन न्यायोपात्तेन धर्मत:।
यथाशक्ति विसृष्टेन प्रीतोऽस्मि द्विजसत्तम।
अहो दानं घुष्यते ते स्वर्गे स्वर्गनिवासिभि:॥ ८३॥
 
 
अनुवाद
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! मैं तुम्हारे द्वारा यथाशक्ति धर्मपूर्वक अर्जित शुद्ध अन्न के दान से अत्यंत प्रसन्न हूँ। हे! स्वर्ग में निवास करने वाले देवता भी तुम्हारे दान की घोषणा करते हैं। 83.
 
‘O best of the Brahmins! I am very pleased with you for the donation of pure food earned righteously according to your capacity. Oh! Even the gods residing in heaven announce your donation there. 83.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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