श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 90: युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  14.90.81 
इत्युक्त्वा तानुपादाय सक्तून् प्रादाद् द्विजातये।
ततस्तुष्टोऽभवद् विप्रस्तस्य साधोर्महात्मन:॥ ८१॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर ब्राह्मण ने अपने हिस्से का सत्तू उठाकर अतिथि को दे दिया। इससे ब्राह्मण उस महापुरुष पर बहुत प्रसन्न हुआ।
 
Saying this, the Brahmin took his share of the sattu and gave it to the guest. Due to this, the Brahmin was very pleased with that noble-natured sage. 81.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)