श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 90: युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना  »  श्लोक 78
 
 
श्लोक  14.90.78 
अवेक्ष्या इति कृत्वाहं दृढभक्तेति वा द्विज।
चिन्त्या ममेयमिति वा सक्तूनादातुमर्हसि॥ ७८॥
 
 
अनुवाद
अतः मुझे अपना परम भक्त, रक्षण और सम्मान के योग्य समझकर, अतिथि को देने के लिए यह सत्तू स्वीकार कीजिए ॥ 78॥
 
Therefore, considering me your staunch devotee, worthy of protection and consideration, please accept this Sattu to give to the guest. ॥ 78॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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