श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 90: युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना  »  श्लोक 77
 
 
श्लोक  14.90.77 
देह: प्राणश्च धर्मश्च शुश्रूषार्थमिदं गुरो:।
तव विप्र प्रसादेन लोकान् प्राप्स्यामहे शुभान्॥ ७७॥
 
 
अनुवाद
मेरा शरीर, प्राण और धर्म-सब कुछ बड़ों की सेवा के लिए है। हे ब्राह्मण! आपके आशीर्वाद से मैं उत्तम लोकों को प्राप्त कर सकता हूँ। 77।
 
My body, life and religion- everything is for the service of the elders. O Brahmin! With your blessings, I can attain the best worlds. 77.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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