श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 90: युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  14.90.67 
तं वै वधू: स्थिता साध्वी ब्राह्मणप्रियकाम्यया।
सक्तूनादाय संहृष्टा श्वशुरं वाक्यमब्रवीत्॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
उसकी पुत्रवधू भी बहुत ही सुशील थी। वह ब्राह्मण को प्रसन्न करने की इच्छा से उसके पास गई और अपने ससुर से बड़ी प्रसन्नता से बोली-॥67॥
 
His daughter-in-law was also very well behaved. With the desire to please the Brahmin, she went to him and spoke to her father-in-law with great pleasure -॥ 67॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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