vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व
»
अध्याय 90: युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना
»
श्लोक 66
श्लोक
14.90.66
भुक्त्वा तानपि सक्तून् स नैव तुष्टो बभूव ह।
उञ्छवृत्तिस्तु धर्मात्मा व्रीडामनुजगाम ह॥ ६६॥
अनुवाद
उस सत्तू को खाने के बाद भी ब्राह्मण का पेट नहीं भरा। यह देखकर उत्तम स्वभाव वाला धर्मात्मा ब्राह्मण बहुत सशंकित हो गया। 66।
Even after eating that sattu, the Brahmin's stomach was not full. Seeing this, the pious Brahmin with a noble attitude became very hesitant. 66.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×