श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 90: युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  14.90.65 
इत्युक्त्वाऽऽदायतान्सक्तून्प्रीतात्माद्विजसत्तम:।
प्रहसन्निव विप्राय स तस्मै प्रददौ तदा॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर श्रेष्ठ ब्राह्मण ने प्रसन्नतापूर्वक सत्तू ले लिया और मुस्कुराते हुए ब्राह्मण अतिथि को परोस दिया।
 
Having said this, the excellent Brahmin gladly took the sattu and smilingly served it to the Brahmin guest. 65.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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