श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 90: युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  14.90.58 
पुत्रार्थो विहितो ह्येष वार्धके परिपालनम्।
श्रुतिरेषा हि विप्रर्षे त्रिषु लोकेषु शाश्वती॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
पुत्र होने का फल यह है कि वह वृद्धावस्था में अपने पिता की रक्षा करे । ब्रह्मर्षे ! यह सनातन श्रुति तीनों लोकों में प्रसिद्ध है ॥58॥
 
The result of having a son is that he should protect his father in his old age. Brahmarshe! This Sanatan Shruti is famous in all three worlds. 58॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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