श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 90: युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  14.90.57 
भवान् हि परिपाल्यो मे सर्वदैव प्रयत्नत:।
साधूनां काङ्क्षितं यस्मात् पितुर्वृद्धस्य पालनम्॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
मुझे सदैव तुम्हारी पूरी सावधानी से सेवा करनी चाहिए, क्योंकि पुण्यात्मा पुरुष सदैव यही चाहता है कि मैं अपने वृद्ध पिता की सेवा करूँ ॥57॥
 
I must always take care of you with all care, because a virtuous person always desires that I should take care of my old father. ॥ 57॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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